शास्त्र तथा भारत के त्रिकालदृष्टा ऋषि परम्परा से यह सर्वविदित है की चौरासी लाख योनियों में तिरासी लाख निनानवे हजार नव सौ निनानवे योनियाँ भोग योनियाँ हैं अर्थात इन योनियों में केवल पूर्व जन्म के सिंचित कर्मानुसार केवल भोग भोगने का ही विधान है किंतु इन समस्त योनियों में से मात्र मानव योनी ही एक ऐसी योनी है जिसमेभोग के साथ साथ कर्म का भी विधान है अर्थात इस योनी में हम अपने पूर्व सिंचित कर्मो के फल को भोगने के साथ अपने इस जन्म के कर्मो से अपना कल्याण कर सकते हैं
शास्त्र बतलाते हैं किमानव योनी का परम लक्ष्य ही परमात्मा से साक्षात्कार कर मोक्ष प्राप्त करना है किंतु परमात्मा से साक्षात्कार हेतु एक ऐसे परम पूर्ण गुरु कि अनिवार्यता प्रतिपादित कि गई है जिसने स्वयं उस परमात्मा से साक्षात्कार किया हो वाही एक मात्र है जो कि हमें मोक्षत्व प्रदान करने का सामर्थ्य रखता है
किंतु क्या यह तथ्य प्रमाणिक है कि बिना पूर्ण गुरु के मोक्ष प्राप्ति नही हो सकती यदि ऐसा है तो इतिहास में महावीर स्वामी और गौतम बुद्ध ने जो निर्वाण तथा केवल्या कि प्राप्ति की वह कैसे की और यदि यह मन भी लिया जावे की उनके पास भी पूर्ण गुरु थे और उन्ही की अनुकम्पा से उन्हें साक्षात्कार हुआ तो फ़िर क्या यह सम्भव है की ऐसे परम गुरु को इतिहास अपने आँचल में स्थान नही दे क्यों इतिहास में उन परमा गुरुओं को स्थान नहीं दिया गया ------------ ?
शनिवार, 18 जुलाई 2009
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